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नक्सलियों ने पत्र जारी कर भाजपा व पूंजीपति घरानों के खिलाफ हमला बोला।

नक्सली संगठन भाकपा माओवादी का चुनाव बहिष्कार और जनता की वैकल्पिक जनसत्ता का आह्वान

नक्सली संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी ने विधानसभा चुनावों के बहिष्कार और जनता की वैकल्पिक जनसत्ता के निर्माण का आह्वान करते हुए अपने प्रभाव क्षेत्र में गतिविधियां तेज कर दी हैं। इनकी गतिविधियां झारखंड के सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट वन प्रमंडल क्षेत्रों में केंद्रित हैं। नक्सलियों ने इन क्षेत्रों में पर्चा वितरण, बैनर-पोस्टर लगाने और स्थानीय जनता को चुनाव से दूर रहने का संदेश देने का प्रयास किया है।

हालांकि, नक्सलियों के इन प्रयासों का प्रभाव राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार या स्थानीय मतदाताओं पर नगण्य दिख रहा है। पिछले चुनावों की तरह इस बार भी मतदाता अपने मतदान अधिकार का उपयोग करने के लिए तैयार हैं।

पिछली घटनाओं की पुनरावृत्ति

लोकसभा चुनावों के दौरान हतनाबुरु गांव के समीप नक्सलियों ने पेड़ गिराकर और चुनाव बहिष्कार के बैनर लगाकर मतदाताओं को डराने का प्रयास किया था। इसके बावजूद मतदाताओं ने साहस दिखाते हुए गिरे हुए पेड़ को पार किया और अपने-अपने मतदान केंद्रों तक पहुंचकर भारी मतदान किया। यही जुझारूपन इस बार भी दिख रहा है।

नक्सली पत्र के मुख्य बिंदु

नक्सलियों द्वारा जारी पत्र में कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर तीखे प्रहार किए गए हैं। इसमें विशेष रूप से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ-साथ प्रमुख पूंजीपति घरानों जैसे अंबानी, अडानी, टाटा, बिड़ला, जिंदल और मित्तल पर निशाना साधा गया है।

हेमंत सोरेन सरकार पर नरम रुख

पत्र में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार पर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया गया है। नक्सलियों का कहना है कि चुनाव से सरकार बदलने से बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होता। उन्होंने व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन और जनता की जनवादी सरकार के निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया।

नक्सलियों की प्रमुख मांगें और संदेश

नक्सलियों ने पत्र और पोस्टरों के माध्यम से निम्नलिखित प्रमुख मांगें और संदेश दिए हैं:

  1. जनता की जन सरकार का निर्माण: – नक्सलियों ने व्यवस्था परिवर्तन और शोषणमुक्त झारखंड के निर्माण के लिए जनयुद्ध और जन आंदोलन तेज करने का आह्वान किया है।
  2. जल, जंगल और जमीन पर जनता का अधिकार: – सीएनटी और एसपीटी एक्ट की रक्षा करने और जमीन पर जोतने वालों के अधिकार सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
  3. गैर-मजरूआ जमीन का पूंजीपतियों को हस्तांतरण रोकना: – सरकार द्वारा लैंडबैंक और लैंडपूल के नाम पर जमीन छीनकर पूंजीपतियों को सौंपने का विरोध।
  4. सुरक्षा बलों की गतिविधियां बंद करने की मांग: – कोल्हान और सारंडा के जंगलों में मोर्टार और गोला-बारूद के उपयोग को रोकने और ऑपरेशन ‘कगार’ को समाप्त करने की मांग की गई है।
  5. पुलिस कैंपों की वापसी: – गांव-गांव में स्थापित पुलिस कैंपों को हटाने की मांग की गई है।
  6. पूंजीपतियों और भाजपा नेताओं के खिलाफ संघर्ष: – टाटा, बिड़ला, जिंदल, अंबानी, अडानी जैसे पूंजीपतियों और उनके समर्थक नेताओं को ‘मार भगाने’ का आह्वान।
  7. बांग्लादेशी घुसपैठियों पर पुनर्विचार: – क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या पर भी ध्यान देने का आग्रह।

प्रचार सामग्री का वितरण

नक्सलियों ने जंगलों में भारी मात्रा में लाल और सफेद कपड़ों पर अपने नारे लिखकर तैयार किए हैं। इन नारों और संदेशों को क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लगाने की योजना बनाई गई है। इसके माध्यम से वे स्थानीय जनता को अपनी विचारधारा के प्रति आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं।

जनता और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

हालांकि नक्सलियों के इन प्रयासों का असर मतदाताओं और राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर नहीं दिख रहा है। क्षेत्रीय जनता पहले की तरह ही उत्साहपूर्वक मतदान की तैयारी कर रही है।

चुनाव प्रचार अभियान में व्यस्त राजनीतिक दलों ने भी नक्सलियों के इस ‘प्रचार युद्ध’ को दरकिनार कर रखा है। क्षेत्रीय नेता और कार्यकर्ता मतदाताओं को विकास और कल्याणकारी योजनाओं का भरोसा दिलाने में जुटे हैं।

निष्कर्ष

नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार और जनसत्ता निर्माण का आह्वान उनकी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास और भागीदारी नक्सलियों के मंसूबों पर पानी फेर रही है। पिछले चुनावों की तरह इस बार भी जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करने को प्रतिबद्ध है।

इस प्रकार, यह स्थिति न केवल नक्सलियों की कमजोर होती पकड़ को दर्शाती है बल्कि झारखंड जैसे राज्यों में लोकतंत्र की जड़ों के मजबूत होने का संकेत भी देती है।

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