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सारंडा जंगल में माओवादी सप्ताह: आदिवासी युवाओं के लिए आतंक का पर्याय

 

शहीदी सप्ताह, स्थापना सप्ताह और पीएलजीए सप्ताह: भय का त्रिकाल

शैलेश सिंह की विशेष रिपोर्ट

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित घना और दुर्गम सारंडा जंगल, माओवादियों का गढ़ माना जाता है। यहां हर साल 28 जुलाई से 3 अगस्त तक शहीदी सप्ताह, 21 सितंबर से 27 सितंबर तक स्थापना सप्ताह, और 2 दिसंबर से 8 दिसंबर तक पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) स्थापना सप्ताह मनाया जाता है। ये तीनों सप्ताह वहां के आदिवासी समाज, खासकर गरीब युवक-युवतियों के लिए एक आतंक की तरह आ जाते हैं।

सप्ताह के पहले से शुरू हो जाता है पलायन

इन विशेष सप्ताहों की शुरुआत के कुछ दिन पहले ही सारंडा के सुदूरवर्ती गांवों से सैकड़ों आदिवासी युवक-युवतियां अपने गांव छोड़कर शहरों या रिश्तेदारों के यहां भाग जाते हैं। इन युवाओं को गांव से हटाने में उनके अभिभावक भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इन हफ्तों के दौरान नक्सली जबरन युवाओं को अपने दस्ते में शामिल करने का प्रयास करते हैं।

नक्सली बनना मजबूरी नहीं, भय का नतीजा

इन सप्ताहों के दौरान नक्सली अपने संगठन में भर्ती के लिए गांव-गांव जाकर युवाओं को पकड़ने या दबाव डालने का काम करते हैं। कई बार बंदूक की नोक पर, तो कभी-कभी अभिभावकों को धमकाकर युवाओं को नक्सली दस्ते में शामिल किया जाता है। यही कारण है कि इन युवाओं के लिए गांव में रहना जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।

अंधेरे जीवन से परिचित हैं युवा

सारंडा के युवाओं को यह भली-भांति मालूम है कि नक्सली बन जाने के बाद उनका जीवन सुरक्षित नहीं रहता। हथियार उठाने के बाद वे न तो खुलेआम बाजार जा सकते हैं, न ही घर लौट सकते हैं, और न ही अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जी सकते हैं। जंगलों में छुपकर रहना, हर वक्त मौत का डर और लगातार पुलिस या सुरक्षा बलों के हमले का खतरा उन्हें अशांत और तनावपूर्ण जीवन में धकेल देता है।

न पैसा, न सुकून, न भविष्य

नक्सली दस्तों में शामिल युवाओं को मजदूरी के बदले मेहनताना नहीं मिलता, और अगर कभी मिलता भी है, तो वह बैंक में जमा नहीं हो सकता। ना तो उनके पास कोई बैंक खाता होता है, ना कोई कानूनी पहचान। वे न तो सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकते हैं, न ही भविष्य के लिए कुछ संजो सकते हैं।

परिवार से दूर, समाज से अलग

नक्सली दस्ते में शामिल युवा वर्षों तक अपने घर नहीं लौट पाते। त्यौहार, शादी-ब्याह, पारिवारिक आयोजन—सबकुछ उनके लिए सिर्फ यादें बनकर रह जाते हैं। कई बार उनके परिजनों को भी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। इस हालत को देखकर गांव के युवा नक्सलियों से जुड़ने के बजाय भाग जाना बेहतर समझते हैं।

अभिभावकों की चुपचाप भागीदारी

युवाओं के इस सामूहिक पलायन में अभिभावकों की मौन सहमति होती है। वे अपने बच्चों को शहरों या दूर के रिश्तेदारों के यहां भेजने की व्यवस्था करते हैं। कई परिवार अपने बच्चों को छिपाकर रखते हैं, ताकि नक्सली उन्हें ना पकड़ सकें। उनके लिए यह समय जंग के मैदान जैसा होता है—जहां अपने बच्चों की सुरक्षा ही सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है।

सरकार और सुरक्षा बलों की भूमिका

हालांकि सरकार और सुरक्षा बल माओवादियों के खिलाफ सघन अभियान चलाते हैं, लेकिन फिर भी हर साल ये सप्ताह माओवादियों के प्रभाव में ही बीतते हैं। प्रशासन के लिए चुनौती यह भी है कि इन गांवों में शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण माओवादियों का प्रभाव बना रहता है। यदि स्थानीय युवाओं को बेहतर विकल्प मिलें, तो वे कभी भी हथियार नहीं उठाएंगे।

समाधान क्या है?

इन समस्याओं से निपटने के लिए ज़रूरत है दीर्घकालिक नीति की।

सरकार को इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे।

नक्सल प्रभावित युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष प्रशिक्षण व पुनर्वास योजनाएं चलानी होंगी।

स्थानीय प्रशासन को गांव स्तर पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

निष्कर्ष: डर की विरासत से बाहर निकलने की जरूरत

सारंडा के जंगलों में माओवादियों द्वारा मनाया जाने वाला यह त्रिस्तरीय सप्ताह एक सामाजिक और मानवीय संकट बन चुका है। आदिवासी युवाओं को सुरक्षा, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के जरिए ही इस भय के साए से बाहर लाया जा सकता है। जब तक इन्हें मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से जीवन जीने का विकल्प नहीं मिलेगा, तब तक यह पलायन और पीड़ा का सिलसिला चलता रहेगा।

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